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Thursday, 12 October 2017

अहोई अष्टमी 2017 व्रत कथा: अहोई आठे की पूजा के दिन इस कथा का पाठ करने से अहोई माता देती है संतान सुख

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Ahoi Ashtami 2017 Vrat Katha: इस दिन सभी माताएं अपनी संतानों के लिए निर्जला व्रत करती हैं। ये व्रत संतानों की लंबी आयु और उनके सुख-समृद्धि के लिए किया जाता हैं

Ahoi Ashtami 2017 Vrat Katha: इस व्रत कथा का अहोई अष्टमी के दिन पाठ करना होता है शुभ।
भारत एक त्योहारों का देश है जहां हर दिन को त्योहार मनाया जाता है। लेकिन कार्तिक माह का ये माह विशेष रुप से त्योहारों का महीना कहलाता है। नवरात्रि के बाद त्योहार शुरु हो जाते हैं। कार्तिक माह की अष्टमी को अहोई अष्टमी कहलाती है। इस दिन सभी माताएं अपनी संतानों के लिए निर्जला व्रत करती हैं। ये व्रत संतानों की लंबी आयु और उनके सुख-समृद्धि के लिए किया जाता है। माना जाता है कि इस दिन के बाद से ही दिवाली का पर्व शुरु हो जाता है। बाजारों में दिवाली की रौनक इस दिन से विशेषकर बढ़ जाती है। इस दिन को लेकर एक मान्यता है कि इस दिन के बाद से दिवाली तक नाकारात्मक शक्तियां तेज हो जाती हैं इसलिए माताएं अपने नवजात और छोटे बच्चों का विशेष ध्यान रखती हैं। इस दिन पूजा के साथ व्रत किया जाता है और परिवार के साथ बैठकर व्रत कथा पढ़ी जाती है। इस दिन अहोई माता की पूजा की जाती है। इस दिन जो दंपती निसंतान होते हैं वो इस कथा का पाठ करते हैं उन्हें माता प्रसन्न होकर संतान का वरदान देती हैं।
अहोई अष्टमी व्रत कथा-
प्राचीन काल में एक साहुकार था, जिसके सात बेटे और सात बहुएं थी। इस साहुकार की एक बेटी भी थी जो दीपावली में ससुराल से मायके आई थी। दीपावली पर घर को लीपने के लिए सातों बहुएं मिट्टी लाने जंगल में गई तो ननद भी उनके साथ हो ली। साहुकार की बेटी जहां मिट्टी काट रही थी उस स्थान पर स्याहु (साही) अपने साथ बेटों से साथ रहती थी। मिट्टी काटते हुए ग़लती से साहूकार की बेटी की खुरपी के चोट से स्याहू का एक बच्चा मर गया। स्याहू इस पर क्रोधित होकर बोली मैं तुम्हारी कोख बाधूंगी। स्याहू के वचन सुनकर साहूकार की बेटी अपनी सातों भाभीयों से एक एक कर विनती करती हैं कि वह उसके बदले अपनी कोख बंधवा लें। सबसे छोटी भाभी ननद के बदले अपनी कोख बंधवाने के लिए तैयार हो जाती है। इसके बाद छोटी भाभी के जो भी बच्चे होते हैं वे सात दिन बाद मर जाते हैं। सात पुत्रों की इस प्रकार मृत्यु होने के बाद उसने पंडित को बुलवाकर इसका कारण पूछा। पंडित ने सुरही गाय की सेवा करने की सलाह दी।
सुरही सेवा से प्रसन्न होती है और उसे स्याहु के पास ले जाती है। रास्ते थक जाने पर दोनों आराम करने लगते हैं अचानक साहुकार की छोटी बहू की नज़र एक ओर जाती हैं, वह देखती है कि एक सांप गरूड़ पंखनी के बच्चे को डंसने जा रहा है और वह सांप को मार देती है। इतने में गरूड़ पंखनी वहां आ जाती है और खून बिखरा हुआ देखकर उसे लगता है कि छोटी बहु ने उसके बच्चे के मार दिया है इस पर वह छोटी बहू को चोंच मारना शुरू कर देती है। छोटी बहू इस पर कहती है कि उसने तो उसके बच्चे की जान बचाई है। गरूड़ पंखनी इस पर खुश होती है और सुरही सहित उन्हें स्याहु के पास पहुंचा देती है। वहां स्याहु छोटी बहू की सेवा से प्रसन्न होकर उसे सात पुत्र और सात बहु होने का अशीर्वाद देती है। स्याहु के आशीर्वाद से छोटी बहु का घर पुत्र और पुत्र वधुओं से हरा भरा हो जाता है। अहोई का अर्थ एक प्रकार से यह भी होता है “अनहोनी को होनी बनाना” जैसे साहुकार की छोटी बहू ने कर दिखाया था। अहोई व्रत का महात्मय जान लेने के बाद आइये अब जानें कि यह व्रत किस प्रकार किया जाता है।

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